नई दिल्ली, संविधान सदन।
देश भर में मनाए जा रहे संविधान दिवस के अवसर पर आज सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली स्थित संविधान
सदन के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल में आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया। वही सेंट्रल हॉल, जहाँ कभी आज़ादी के संकल्प
गूंजे थे और जहाँ से नए भारत की लोकतांत्रिक यात्रा ने औपचारिक रूप से शुरुआत की थी।
कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने भारतीय संविधान के निर्माताओं को नमन करते हुए कहा कि संविधान सिर्फ कानूनों
की किताब नहीं, बल्कि भारत के सपनों, संघर्षों और संकल्पों का जीवंत दस्तावेज है।
संविधान निर्माताओं के विज़न को याद, जिम्मेदारी का एहसास फिर ताज़ा 🎯
संविधान दिवस समारोह में प्रधानमंत्री ने देशवासियों की तरफ से संविधान सभा के महान सदस्यों –
डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पंडित नेहरू, सरदार पटेल और अन्य सभी संविधान निर्माताओं – को
भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
उन्होंने इस मौके पर स्पष्ट संदेश दिया कि:
संविधान के आदर्शों – न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता – को ज़मीन पर उतारना सिर्फ सरकार की नहीं, हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है।
पीएम मोदी ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक मजबूती इसी बात पर निर्भर करती है कि हम संविधान के मूल सिद्धांतों
को कितना ईमानदारी से निभाते हैं, चाहे वह शासन व्यवस्था हो या जनजीवन।
सोशल मीडिया पर भी गूंजा संविधान दिवस का संकल्प
प्रधानमंत्री ने अपने आधिकारिक X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर भी संविधान दिवस का संदेश साझा किया। पोस्ट में
उन्होंने लिखा कि आज सेंट्रल हॉल में संविधान दिवस समारोह में शामिल होकर उन्होंने –
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संविधान निर्माताओं के दूरदर्शी विज़न को याद किया
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और संवैधानिक आदर्शों को मजबूत करने की हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को दोबारा दोहराया
यह संदेश सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होता रहा और संविधान दिवस से जुड़े हैशटैग लगातार ट्रेंड करते दिखे।
लोकतंत्र, अधिकार और कर्तव्य – तीनों पर बराबर ज़ोर
संविधान दिवस के संदर्भ में प्रधानमंत्री का यह संदेश सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि देश के नागरिकों के लिए एक रिमाइंडर की तरह सामने आया –
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कि अधिकारों के साथ–साथ कर्तव्यों की भी वही अहमियत है
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कि संविधान ने हर भारतीय को आवाज़ दी है, लेकिन साथ ही यह अपेक्षा भी की है कि हम देश, समाज और व्यवस्था
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के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी गंभीरता से निभाएं
नई पीढ़ी के लिए यह समारोह एक तरह से लोकतंत्र की पाठशाला जैसा रहा, जहाँ संसद भवन के सेंट्रल हॉल से निकला
संदेश यह था कि संविधान की मर्यादा ही लोकतंत्र की मज़बूती है।










