कुमाऊँ की वादियों में इन दिनों रंगों से पहले सुरों की फुहार पड़ रही है। चंपावत की पवित्र धरती पर खड़ी होली महोत्सव का भव्य शुभारम्भ हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्चुअल माध्यम से शिरकत कर पूरे प्रदेश को एक भावनात्मक संदेश दिया—“लोकसंस्कृति सिर्फ परंपरा नहीं, हमारी पहचान है।” 🎯
कलश संगीत कला समिति द्वारा आयोजित इस महोत्सव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कुमाऊँ की खड़ी होली और बैठकी होली केवल पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना की जीवंत मिसाल हैं।
🌸 “खड़ी-बैठकी होली हमारी सांस्कृतिक धरोहर” – मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि कुमाऊँ अंचल की होली परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी लोक आस्था और सामूहिक एकता को मजबूत करती आई है।
उन्होंने कहा कि ढोल, मंजीरे और शास्त्रीय रागों में गाए जाने वाले पारंपरिक होली गीत न सिर्फ बचपन की यादें ताजा करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी बनते हैं।
धामी ने दोहराया कि राज्य सरकार लोककला, लोकभाषा और लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है। प्रदेशभर में मेलों और महोत्सवों को बढ़ावा देकर स्थानीय कलाकारों को मंच दिया जा रहा है, जिससे उन्हें नई पहचान और अवसर मिल रहे हैं।
🎤 संस्कृति के साथ सामाजिक सौहार्द का संदेश
मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे आयोजन समाज को अपनी परंपराओं से जोड़ते हैं और सामूहिकता की भावना को मजबूत करते हैं।
उन्होंने कलश संगीत कला समिति की सराहना करते हुए कहा कि यह समिति क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि को संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा रही है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, जनप्रतिनिधि और कलाकारों की उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि चंपावत में संस्कृति सिर्फ मंच तक सीमित नहीं, बल्कि जन-जन के दिलों में बसती है।
🎯 क्यों खास है चंपावत की खड़ी होली?
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शास्त्रीय रागों पर आधारित पारंपरिक प्रस्तुति
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सामूहिक गायन की अनूठी परंपरा
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पीढ़ियों को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु
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सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक
कुमाऊँ की इस सुरमयी परंपरा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि विकास की दौड़ में भी उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती से थामे हुए है।










