उत्तराखंड की राजनीति और जनसेवा का एक बड़ा अध्याय मंगलवार को हमेशा के लिए शांत हो गया। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय सेना के मेजर जनरल रह चुके भुवन चंद्र खंडूरी का लंबी बीमारी के बाद देहरादून में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर सामने आते ही पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर दौड़ गई।
देहरादून के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। अपनी सादगी, अनुशासन और साफ-सुथरी राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले खंडूरी के जाने से राजनीति ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जनता भी भावुक नजर आई। सोशल मीडिया पर हजारों लोग उन्हें “ईमानदार पहाड़ी नेता” और “उत्तराखंड का सख्त लेकिन साफ चेहरा” कहकर श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
सेना से राजनीति तक… अनुशासन की मिसाल रहे खंडूरी
भुवन चंद्र खंडूरी सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि भारतीय सेना के मेजर जनरल के रूप में देश सेवा करने वाले उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे जिन्होंने राजनीति में भी अनुशासन और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी।
उन्होंने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में दो बार जिम्मेदारी संभाली। उनके कार्यकाल को भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त फैसलों और प्रशासनिक अनुशासन के लिए याद किया जाता है।
राजनीतिक गलियारों में उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर देखा जाता था जो सत्ता से ज्यादा व्यवस्था सुधारने पर जोर देते थे। यही वजह रही कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में आज भी लोग उन्हें सम्मान के साथ “जनरल साहब” कहकर याद करते हैं।
मुख्यमंत्री धामी समेत कई नेताओं ने जताया दुख
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खंडूरी के निधन को राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि खंडूरी का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के साथ-साथ आम लोगों ने भी सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट साझा कर श्रद्धांजलि दी। देहरादून, पौड़ी, श्रीनगर और गढ़वाल क्षेत्र में उनके समर्थकों के बीच गहरा दुख देखा गया।
उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा याद रहेगा यह नाम 🌄
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जिन नेताओं ने प्रदेश की प्रशासनिक पहचान गढ़ी, उनमें भुवन चंद्र खंडूरी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। सड़क, प्रशासन और पारदर्शी शासन को लेकर उनकी सोच ने राज्य की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी।
उनकी कार्यशैली इतनी सख्त मानी जाती थी कि सरकारी महकमों में समयबद्ध कामकाज को लेकर उनकी मिसाल दी जाती थी। जनता के बीच उनकी छवि एक ईमानदार और जमीन से जुड़े नेता की रही।
आज उनके निधन के साथ उत्तराखंड ने सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक अनुशासित सैनिक, सख्त प्रशासक और जननेता को खो दिया।










