यरुशलम | 8 नवंबर 2026
इजरायल की राजनीति में इन दिनों एक नया चेहरा सबसे ज्यादा चर्चा में है। देश के पूर्व सेना प्रमुख और याशर पार्टी के नेता गादी आइज़ेनकोट को राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने अगली सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है। 27 अक्टूबर को हुए आम चुनाव में किसी भी राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। ऐसे में आइज़ेनकोट को सरकार बनाने का पहला मौका मिलना इजरायल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।
खास बात यह है कि आइज़ेनकोट केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि उन्होंने इजरायल की सेना में करीब 41 साल तक सेवाएं दी हैं। वह देश के सैन्य इतिहास के महत्वपूर्ण दौर में सेना की कमान संभाल चुके हैं। अब उनका लक्ष्य सैन्य नेतृत्व के बाद देश की राजनीतिक कमान हासिल करना है।
कौन हैं गादी आइज़ेनकोट?
गादी आइज़ेनकोट का जन्म वर्ष 1960 में इजरायल के तिबेरियास शहर में हुआ था। उनका परिवार मोरक्को मूल का यहूदी परिवार है। उनका पालन-पोषण दक्षिणी इजरायल के इलात शहर में हुआ।
साल 1978 में उन्होंने इजरायली सेना की गोलानी इन्फैंट्री ब्रिगेड में भर्ती होकर अपने सैन्य करियर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्होंने सैनिक के रूप में काम किया और धीरे-धीरे अपनी मेहनत और नेतृत्व क्षमता के दम पर सेना में कई महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे।
उन्होंने अलग-अलग सैन्य इकाइयों की कमान संभाली। इसके बाद वह उत्तरी कमान के प्रमुख, सेना के ऑपरेशन निदेशालय के प्रमुख और उप-सेना प्रमुख जैसे अहम पदों पर भी रहे।
2015 से 2019 तक संभाली इजरायली सेना की कमान
गादी आइज़ेनकोट 16 फरवरी 2015 को इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के 21वें चीफ ऑफ जनरल स्टाफ नियुक्त हुए। इस पद पर उन्होंने जनवरी 2019 तक सेवाएं दीं।
उनके कार्यकाल के दौरान इजरायल की सुरक्षा चुनौतियों में गाजा, लेबनान और सीरिया से जुड़े खतरे प्रमुख रहे। उन्होंने सेना की क्षमताओं को मजबूत करने, खुफिया तंत्र और सैन्य अभियानों को बेहतर बनाने पर काम किया।
लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ संभावित संघर्ष को लेकर उनकी सैन्य रणनीति भी चर्चा में रही। उनके नाम से जुड़ी ‘दहिया डॉक्ट्रिन’ को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस हुई। इस रणनीति में दुश्मन के सैन्य ढांचे को समर्थन देने वाले क्षेत्रों के खिलाफ भारी सैन्य बल के इस्तेमाल की अवधारणा शामिल थी।
सेना से राजनीति तक का सफर
जनवरी 2019 में सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद आइज़ेनकोट ने सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में अपनी भूमिका बढ़ाई। वर्ष 2022 में उन्होंने औपचारिक रूप से चुनावी राजनीति में प्रवेश किया और बेनी गैंट्ज के राजनीतिक गठबंधन के साथ इजरायल की संसद नेसेट पहुंचे।
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद बने युद्ध मंत्रिमंडल में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस दौरान वह युद्ध से जुड़े फैसलों और रणनीतिक चर्चाओं का हिस्सा रहे।
बाद में बेनी गैंट्ज से राजनीतिक मतभेदों के बाद उन्होंने अलग रास्ता चुना। सितंबर 2025 में उन्होंने अपनी याशर पार्टी की शुरुआत की। इसके बाद वह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे।
चुनाव में आइज़ेनकोट को कितनी सीटें मिलीं?
27 अक्टूबर 2026 को हुए इजरायल के आम चुनाव में किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिला। देश की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
चुनाव में राजनीतिक स्थिति इस प्रकार रही:
- नेतन्याहू के दक्षिणपंथी और धार्मिक गठबंधन को 53 सीटें मिलीं।
- आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले चार दलों के विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलीं।
- अरब दलों ने कुल 19 सीटें हासिल कीं।
राष्ट्रपति के साथ हुई राजनीतिक दलों की सलाह-मशविरा प्रक्रिया में 67 सांसदों ने आइज़ेनकोट को सरकार बनाने की जिम्मेदारी देने की सिफारिश की, जबकि 46 सांसदों ने नेतन्याहू का समर्थन किया। सात सांसदों ने किसी उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया।
28 दिन में साबित करना होगा बहुमत
राष्ट्रपति ने आइज़ेनकोट को सरकार बनाने का पहला मौका दिया है। उन्हें सरकार गठन के लिए 28 दिन मिलेंगे। जरूरत पड़ने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दिया जा सकता है।
हालांकि, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को एक साथ लाने की है। विपक्षी गठबंधन के पास खुद 48 सीटें हैं। अरब दलों के समर्थन से संख्या बढ़ सकती है, लेकिन उनके साथ सरकार बनाने को लेकर आइज़ेनकोट के कुछ सहयोगियों को आपत्ति है।
इजरायल की राजनीति में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आइज़ेनकोट 61 सांसदों का समर्थन जुटा पाते हैं या नहीं।
क्या इजरायल को मिलेगा नया प्रधानमंत्री?
गादी आइज़ेनकोट को सरकार बनाने का मौका मिलना उनके राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा पड़ाव है। हालांकि, राष्ट्रपति का जनादेश मिलना प्रधानमंत्री बन जाने के बराबर नहीं है। उन्हें संसद में बहुमत साबित करना होगा।
यदि वह सफल होते हैं तो इजरायल में लंबे समय से प्रभावशाली रहे नेतन्याहू के राजनीतिक नेतृत्व का अंत हो सकता है। वहीं, सरकार बनाने में विफल रहने पर राष्ट्रपति किसी अन्य उम्मीदवार को मौका दे सकते हैं। अंततः राजनीतिक गतिरोध दूर नहीं हुआ तो देश में नए चुनाव भी हो सकते हैं।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि चार दशक से अधिक समय तक सेना में सेवाएं देने वाले गादी आइज़ेनकोट क्या अब इजरायल की राजनीतिक कमान भी संभाल पाएंगे।











