हिमालय की गोद में बसे माणा गांव में बुधवार को कुछ अलग ही माहौल था। ठंडी हवाओं के बीच गूंजते मांगलगीत, पहाड़ी परंपराओं की खुशबू और आत्मनिर्भरता की चमक—इन सबके बीच पहुंचे पुष्कर सिंह धामी ने सीमांत भारत की इस आखिरी नहीं, बल्कि “पहली” बस्ती की नब्ज को करीब से महसूस किया।
🌿 चारधाम यात्रा को हरित बनाने का संदेश
मुख्यमंत्री ने साफ कहा—आस्था के इस सफर को जिम्मेदारी के साथ निभाना होगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की कि चारधाम यात्रा को सुरक्षित, स्वच्छ और प्लास्टिक मुक्त बनाएं, ताकि देवभूमि की पवित्रता बरकरार रहे।
“पर्यावरण बचाना ही असली पूजा है,”—यह संदेश सीधे पहाड़ों से देशभर तक गया।
👩🦱 ‘लखपति दीदी’ बनीं माणा की ताकत
माणा की पहचान अब सिर्फ सीमांत गांव नहीं, बल्कि 100% “लखपति दीदी” गांव के रूप में हो रही है। जब धामी ने यहां की महिलाओं से मुलाकात की, तो उनके आत्मविश्वास और हुनर ने साफ कर दिया कि बदलाव जमीनी स्तर पर हो रहा है।
ऊन के कपड़े, हस्तशिल्प, मसाले, पापड़, कालीन और होमस्टे—यहां की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। मुख्यमंत्री ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे इन स्थानीय उत्पादों को खरीदें, ताकि गांव की अर्थव्यवस्था और मजबूत हो सके।
🚩 मोदी विज़न: ‘अंतिम’ से ‘प्रथम’ तक
धामी ने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सीमांत गांवों की सोच बदली है।
जो गांव कभी देश का “अंतिम छोर” माने जाते थे, आज उन्हें “प्रथम गांव” का दर्जा देकर विकास की मुख्यधारा में लाया जा रहा है।
🛣️ वाइब्रेंट विलेज से बदल रही तस्वीर
वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत माणा जैसे गांवों में सड़क, रोजगार और पर्यटन के नए अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे स्थानीय युवाओं और महिलाओं को अपने ही गांव में काम और सम्मान मिल रहा है।
💼 महिलाओं ने लिखा आत्मनिर्भरता का नया अध्याय
माणा गांव में 12 स्वयं सहायता समूह और 82 महिलाएं—और खास बात, हर एक महिला “लखपति दीदी” बन चुकी है।
कृषि, डेयरी, मशरूम, पोल्ट्री, होमस्टे और कुटीर उद्योग—हर क्षेत्र में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। उनके उत्पाद अब बाजार तक पहुंच रहे हैं, जिससे उनकी आय लगातार बढ़ रही है।
🎯 निष्कर्ष
माणा अब सिर्फ एक सीमांत गांव नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की जीवंत मिसाल बन चुका है। यहां की महिलाएं, यहां का विकास और यहां की सोच—तीनों मिलकर बता रहे हैं कि जब इरादे मजबूत हों, तो पहाड़ भी रास्ता बना देते हैं।










