📍 नई दिल्ली | 27 मई 2026
देश की चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची को लेकर चल रही बड़ी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग की ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया को वैध ठहरा दिया। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि वोटर लिस्ट को अपडेट और पारदर्शी बनाए रखना Election Commission of India का संवैधानिक अधिकार है और इसे गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले में दायर सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि “मुक्त और निष्पक्ष चुनाव” लोकतंत्र की आत्मा हैं, इसलिए मतदाता सूची का समय-समय पर गहन पुनरीक्षण जरूरी है।
क्या है SIR और क्यों मचा था विवाद?
दरअसल, चुनाव आयोग ने बिहार से शुरू होकर कई राज्यों में वोटर लिस्ट की “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” प्रक्रिया लागू की थी। इसका मकसद मृत, डुप्लीकेट या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को अधिक सटीक बनाना बताया गया।
लेकिन इस प्रक्रिया पर सवाल भी उठे। कई सामाजिक संगठनों और नेताओं ने आरोप लगाया कि इससे गरीब, प्रवासी और पुराने दस्तावेज़ न रखने वाले लोगों का वोटिंग अधिकार प्रभावित हो सकता है। कुछ याचिकाओं में इसे “NRC जैसी प्रक्रिया” तक बताया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि SIR केवल वोटर लिस्ट की जांच और सुधार की प्रक्रिया है, न कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का माध्यम। अदालत ने कहा कि किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटने का मतलब उसकी नागरिकता खत्म होना नहीं है।
कोर्ट ने यह भी माना कि चुनाव आयोग अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया चला सकता है।
चुनाव आयोग ने क्या दिया था तर्क?
चुनाव आयोग ने कोर्ट में कहा था कि मतदाता सूची को साफ और भरोसेमंद बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। आयोग के अनुसार, फर्जी, डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाना जरूरी है ताकि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
आयोग ने यह भी कहा कि यह कोई “कठोर नागरिकता जांच” नहीं बल्कि प्रशासनिक सत्यापन प्रक्रिया है, जो बूथ स्तर पर की जाती है।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों की चिंता बरकरार
हालांकि अदालत के फैसले के बाद भी इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी रहने के संकेत हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि दस्तावेज़ आधारित सत्यापन से कमजोर वर्गों को परेशानी हो सकती है। वहीं कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि प्रक्रिया में कहीं गड़बड़ी मिलती है तो सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी।
लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों से जुड़े इस फैसले को आने वाले चुनावों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 🎯










