दिल्ली में खुला ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’: उत्तराखंड की खुशबू अब राष्ट्रीय राजधानी की गलियों में! 🛍️

नई दिल्ली की चकाचौंध में अब पहाड़ों की सादगी, शुद्धता और संस्कृति की महक भी घुल गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को उत्तराखंड निवास परिसर में ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ का भव्य उद्घाटन किया — एक ऐसा मंच जो अब देश-दुनिया को बताएगा कि उत्तराखंड सिर्फ देवभूमि ही नहीं, शिल्प, स्वाद और संस्कृति की भी धरती है।

🎯 ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ सिर्फ एक आउटलेट नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा को दिल्ली में बसाने की कोशिश है। यहाँ बुरांश का शरबत, पहाड़ी दालें, जंगली शहद, पारंपरिक मसाले और हाथ से बने वस्त्र जैसे सैकड़ों जैविक व सांस्कृतिक उत्पादों को राष्ट्रीय मंच मिल रहा है।


🌿 लोकल को ग्लोबल बनाने की पहल

मुख्यमंत्री ने कहा, “यह पहल हमारे पर्वतीय अंचलों की आवाज है। इसका मकसद है— उत्तराखंड के मेहनतकश कारीगरों को वो पहचान दिलाना, जिसके वो असल हकदार हैं।”
सरकार की यह दूरदर्शी योजना उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगी और हजारों स्थानीय शिल्पकारों, किसानों और महिलाओं के लिए नई रोज़गार संभावनाएं खोलेगी।


🛒 कहां-कहां पहुंचे ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’?

चारधाम यात्रा को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड सरकार ने 13 से ज्यादा प्रमुख तीर्थ और पर्यटक स्थलों पर फ्लोर स्टैंडिंग यूनिट्स और रिटेल कार्ट्स स्थापित किए हैं।
🕉️ केदारनाथ से लेकर बद्रीनाथ, ऋषिकेश से मसूरी, और नैनीताल से कौडियाला तक, ये यूनिट्स श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।

🏨 इसके साथ ही मसूरी के मैरियट, देहरादून के ताज व एफआरआई, एलबीएस अकादमी से लेकर दिल्ली हाट तक इन कार्ट्स को स्थापित किया जा रहा है।


🤝 होटल इंडस्ट्री से भी करार

अब उत्तराखंड के उत्पाद सीधे हयात, ताज, मैरियट, वेस्टिन और जेपी ग्रुप जैसे देश के शीर्ष होटलों में उपलब्ध होंगे। यह साझेदारी न सिर्फ़ राज्य के प्रोडक्ट्स की ब्रांडिंग करेगी, बल्कि सतत पर्यटन को भी बढ़ावा देगी।

📦 ऑनलाइन उपलब्धता की बात करें तो ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ के प्रोडक्ट्स अब Amazon, Blinkit और houseofhimalayas.com पर भी मौजूद हैं — यानी अब दिल्ली-मुंबई से लेकर चेन्नई-बेंगलुरु तक कोई भी पहाड़ का स्वाद मंगा सकता है।


🪔 आत्मनिर्भर उत्तराखंड की ओर एक बड़ा कदम

2013 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में इस ब्रांड की परिकल्पना रखी थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह सपना इतनी तेजी से ज़मीन पर उतर जाएगा।

आज यह पहल ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन उत्तराखंड’ को मजबूती दे रही है, और हर पहाड़ी परिवार के लिए गर्व, रोजगार और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुकी है।