रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ का रास्ता साफ, भारत-चीन पर भी नजर; अमेरिकी सीनेट से बिल पास

वॉशिंगटन | 13 अगस्त 2026

रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव बढ़ गया है। अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़ा ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ पारित कर दिया है। बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस की ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है।

भारत और चीन समेत रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, अभी भारत पर 100% टैरिफ लागू नहीं हुआ है; इसके लिए बिल को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित होकर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना जरूरी है।

86-11 के वोट से सीनेट में पास हुआ बिल

अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को इस विधेयक को 86-11 के वोट से मंजूरी दी। बिल का उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा से होने वाली आय को सीमित करना है।

इस कानून में राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ कड़े व्यापारिक कदम उठाने की शक्ति देने का प्रावधान है, जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल या गैस खरीदते हैं। इसमें टैरिफ की अधिकतम दर 100 प्रतिशत तक रखी गई है।

📢 महत्वपूर्ण बात यह है कि यह व्यवस्था अपने आप 100% टैरिफ लागू नहीं करती। यदि बिल कानून बनता है, तो राष्ट्रपति को इस शक्ति का इस्तेमाल करने का अधिकार मिलेगा।

भारत और चीन पर क्यों है नजर?

भारत और चीन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं। इसी वजह से अमेरिकी प्रतिबंध कानून में प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था का संभावित असर दोनों देशों पर पड़ सकता है।

बिल का व्यापक उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि रूसी ऊर्जा की खरीद से मॉस्को को आर्थिक संसाधन मिलते हैं, जिन्हें यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में इस्तेमाल किया जा सकता है।

अभी भारत पर नहीं लगा 100% टैरिफ

इस मुद्दे पर सबसे अहम स्थिति यह है कि सीनेट से बिल पास होना और भारत पर 100% टैरिफ लग जाना एक ही बात नहीं है।

बिल को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जाना है। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी की जरूरत होगी। तभी यह कानून बनेगा और इसके बाद ही राष्ट्रपति को उसमें दी गई टैरिफ संबंधी शक्ति का इस्तेमाल करने का अधिकार मिलेगा।

इसलिए फिलहाल इसे भारत पर 100% अमेरिकी टैरिफ लागू होने के रूप में देखना सही नहीं होगा।

प्रतिनिधि सभा में हो सकती है असली परीक्षा

सीनेट में भारी बहुमत से मंजूरी मिलने के बावजूद प्रतिनिधि सभा में बिल को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कुछ सांसदों और उद्योग जगत को आशंका है कि राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने से अमेरिकी आयातकों और उपभोक्ताओं की लागत बढ़ सकती है।

सीनेट में राष्ट्रपति को दिए जाने वाले टैरिफ अधिकारों को हटाने का प्रस्ताव भी खारिज कर दिया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद 31 अगस्त को लौटने पर इस विधेयक पर आगे विचार हो सकता है।

बिल का नाम लिंडसे ग्राहम के नाम पर क्यों?

इस विधेयक का नाम रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है। रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक कदमों की वकालत करने वाले ग्राहम ने इस कानून को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

11 जुलाई को उनकी मृत्यु के बाद सीनेट की सीट पर उनकी बहन डार्लिन ग्राहम को नियुक्त किया गया। बिल के पारित होने के दौरान उन्होंने सदन में अंतिम मतदान का परिणाम पढ़ा।

रूस के साथ-साथ ईरान पर भी असर

यह विधेयक केवल रूस तक सीमित नहीं है। इसमें ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाने के प्रावधान शामिल हैं।

कानून के तहत रूसी अधिकारियों के खिलाफ प्रतिबंधों के साथ-साथ रूस की ऊर्जा व्यवस्था और प्रतिबंधों से बचने वाले नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ाने का उद्देश्य रखा गया है। इसके अलावा ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्र से जुड़े प्रतिबंधों की अवधि बढ़ाने का प्रावधान भी इसमें शामिल है।

आगे क्या होगा?

अब इस विधेयक की अगली बड़ी परीक्षा अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में होगी। यदि प्रतिनिधि सभा भी इसे मंजूरी देती है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे कानून का रूप देते हैं, तभी प्रस्तावित नई टैरिफ शक्तियां प्रभावी हो सकेंगी।

भारत के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि 100% टैरिफ की संभावना वाला प्रावधान सीनेट से पारित हो चुका है, लेकिन भारत पर ऐसा टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। 🇮🇳